मेरी अस्थियों का विसर्जन,
करना तू हे मानव,
मेरी माँ के चरणों मे अर्पण |
उस जीवन-दायिनी माँ को,
मेरा कोटि-कोटि नमन,
जिसके लिए किया है मैंने,
अपने जीवन का समर्पण |
मेरी कुर्बानी व्यर्थ नहीं है,
रंग कभी तो दिखलाएगी,
जिनकी मुट्ठियाँ अभी बंद है,
कभी न कभी तो खुल जाएगी |
मेरे लहू का एक-एक क़तरा,
आँसू बनकर टपकेगा,
अत्याचार किया जिसने भी,
फिर न कभी वो संभलेगा |
जो सोया है नींद मे अब तक,
तब कहीं जाकर जागेगा,
हे मानव चिंता मत कर,
एक रोज़ अंधेरा भागेगा.......!!
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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