खचाखच भोरयाँ कमरा मा, सुददी बैठिक एक दिन,
अफुर मुंड कन्ज्याई, सबुन मन बणाई,
कुछ अलग कर्णुक, दम भार्णुक,
तय ह्वाई, मंचन कर्णुक |
नौ सुणदी बिथेक, छूटि कम्पन,
सोची..... मैन नि कर सकण यु मंचन,
म्यार बसकि बात नि छ,
अर जू भी हों भया.......म्यार इन हालात नि छन,
फंड फुका..... जाण द्या.....क्या धरयुं ते मंचन मा...??
मैं ता खुश छौं, अफुर ये वीकेंड मा |
उन बोली.......ये मा डनकि क्या बात छ,
कई-कई सन मिल्दी यनि सौगात छ,
खुशनसीब छ तू.........जू पता चली,
अरे.........बोल्नकू मौका भी कभी कई सन मिली...??
स्टेज फियर भी क्वी फियर होंदु....??
घम्म फाल मार्ली......तभी त दूर होलू |
मैन बोली........ मैन नि बोल सकण,
सब्बुक अग्ने .........गिच्चू नि खोल सकण,
जोलु..........त दिल जोर से धड्कलू,
आर देखण वालूकु गुस्सा.....मै फर भड़क्लू |
उन बोली..........दिल थामितें मंच पर चढ़ी,
जू मन मा आलू, वेही सन पढ़ी,
दर्शकोंकु क्या छ................??
समझ्ला......... त तालि बजाला,
निथर अफुर मुंड कन्ज्याला |
यिं बात पर उन्की........मैन अफुर दिल समझाई,
अर कविता पाठ कर्णुक विचार बनाई,
लम्बी सी सांस तब भितर खैन्छी,
अर अफ्रू द्वी आंखि जोर से भिंची |
डर-डरीतें मैन कदम बढ़ायी छ,
जब उन मैंसन धान्ड्स बंधाई छ,
आँख खोल्दी बिथेक ......दर्शकों सन बैठ्युं पायी,
गिच्छु बीटिं झट से "भगवन" निकल ग्यायी |
सबुकी आंखि मैफर टिकीं छे,
जू तीर बनितें मैफर चुभ्णी छे,
फेर डरी तें मैन अफ्रू मन बणे दिनी,
अर एक ही सांस मा सार्री "मुखड़ा" सुणे दिनी |
मुखड़ा सुनदी बिथेक ....... सन्नाटू छेगे,
इन लगी.......जन दर्शकों तें सांप सुंघिगे,
बान्धितें बोरिया बिस्तर.......... मैन सोची भागी जों,
यां चे पैली, कि क्वी............ जागिजो.....??
फिर सोची......जब उर्ख्याल मा मुंड धोलि ले,
त गंज्यालन क्या डन.........??
जू होलू ............ देखि जयालू,
अब त मैन ....... जरूर कुछ करन |
पर यु क्या .....?? देख बडू अचरज मा छ पोडयूँ,
मेरी पंक्तियों...... मा हरेक छे ख्वेयुं,
यु देखि तें मेरी मुखडी मा रौनक आयी,
कि मेरी कविता सुणितें.....कैन अफ्रू मुंड नि कंज्याई |
मेरी पंक्तियोना दर्शकोंकु मन छ जीती,
तलियोंकी गडगडाहट....... चौ तरफा तब गूंजी,
सोची नि छे....आपबीतिकू यु परिणाम होलू....??
आफु पर करयूँ परिक्षण इतना कामयाब होलू .....??
कविता पाठन मेरु आत्मविश्वास जगाई,
कन बोल्दन मंच पर........यु मैंसन सिखाई,
डौर आदिम सन कमज़ोर बनौंदु ............सुणि छ,
पर याद रलु .........आज ये मंच पर,
यान्क विपरीत भी कुछ हवे छ......??
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
No comments:
Post a Comment