ये जहाँ......एक मुसाफिर ख़ाना है,
जिसे देखो.......वही अनजाना है,
सूरतें मिलती- जुलती सी हैं सबकी,
पर हर कोई एक-दूसरे से बेगाना है |
ज़िन्दगी का बोझ सामान की तरह,
कांधों पर लिए चले जा रहे हैं,
बिना किसी की परवाह किये,
सबकी नज़र से बचे जा रहे हैं |
अपनी ही मस्ती में मगन हैं सारे,
क्यों कर फिक्र हो किसी की उन्हें..?
ऐसे चले जा रहे हैं के जैसे,
कोई कारवां मिल गया हो उन्हें |
मंजिल है एक सभी की.... हैं चलते,
फिर भी हैं कितने अनजान सबसे,
कोई नहीं है समझता यहाँ पर,
रस्ता है जाता सफ़र का इधर से |
सच तो सच है झुठला न पाएंगे,
ये ज़िन्दगी बस... यहीं छोड़ जायेंगे,
साथ किसी का मिले न मिले फिर भी,
हैं तो मुसाफिर......कहाँ भूल पाएंगे....?
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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