Thursday 18th March 2010 at 5:49pm |
ये कैसा शोर है...........!!
दूर...........गगन में उड़ते हुए मेघों का |
मानो............किसी को ललकार रहे हों,
स्वयं को तेयार कर रहे हों,
किसी द्वन्द के लिए....................!!
द्वन्द..........!! कैसा द्वन्द............??
हाँ........!! ये द्वन्द ही तो है |
वायु के तीव्र वेग का मेघों से द्वन्द,
मेघों का बूंदों से,
बूंदों का धरती से,
धरती का सागर से,
सागर का वायु से,
और वायु का फिर मेघों से |
ये द्वन्द ही तो है.....................!!
जो इस प्रक्रिया को चला रहा है |
कभी सोचा है........................!!
ये द्वन्द अगर समाप्त हो गया तो.....??
प्रकृति का विनाश हो गया तो........??
मानव की कल्पना और कल्पना का स्रोत,
शुन्य हो गया तो......................??
तब क्या होगा.........................??
क्या करेगा मानव.....................??
क्या अपनी आँखों के आगे,
इस सृष्टि का विनाश देख पायेगा........??
नहीं..........!! ऐसा नहीं हो सकता......!!
ये द्वन्द प्रकृति और मानव-कल्याण के लिए है,
शायद इसलिए निर्माता ने,
इसका निर्माण किया है,
इसके निरंतर चलने में ही भलाई है,
ये द्वन्द समाप्त नहीं होना चाहिए ||
नहीं...........!! कभी नहीं...................!!
"रोहिणी संकलन" से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
ms. rohini ye kavita prakrati ke prati aapka prem bhaav aur chinta, dono hi darshati hai.
ReplyDeleteshubhkamnae.....
achchhi rachna hai. manav aur prakriti ek dusre ke liye bane hain. dono ka vajud ek dusnre se hi hai. very nice....
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