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Wednesday, May 22, 2013

अट्टहास...!!! "रोहिणी संकलन" से...

created on Sunday 7th Nov. 2010 at 7pm.

एक दिन चलते-चलते यूँ ही,
कदम डगमगाए............
ये सोचकर कि कहाँ जा रहे हैं ?
हम लडखडाये..............!

आसमान की उचाईयों में,
जाने कहाँ खो गए हम.....?
तैरते हुए बादलों के उपर से,
कब निकल गए हम......?

नज़रें ज़मीं पर पड़ते ही,
किसी ने अट्टहास लगाया,
डर से थर्राए बदन का,
शायद किसी ने मज़ाक उड़ाया |

हलकी सी खुसफुसाहट,
कहीं से सुनी मैंने.....!
संभल कर चल.....गिर पड़ेगी,
लगी मुझसे वो कहने.....!

उसकी व्यंग भरी बातें,
नसों में ठहर गयी,
शरीर की गर्माहट को,
बर्फ सा बना गयी.......!

मस्तिष्क शून्य हुआ मेरा,
जब शाम ढलने लगी....!
किसने कहा होगा ऐसा..?
सोच में चलने लगी......!

मैं न होती तो तेरा अस्तित्व,
कहाँ होता भला......?
मेरी बदौलत ही तेरा,
ये दिल है मनचला......!

तुझको सहारा दे कर ही मैंने,
परवान चढ़ाया है......!
मुझे थाम कर ही तुने,
हर कदम बढाया है....!

न जाने क्यों इन बातों से,
मन को आघात पहुंचा,
आखिर कौन है ये.....?
चलते-चलते फिर मैंने सोचा.....!

मन विचलित था मेरा,
साथ ही उत्सुक.....!
मेरी परिस्थिति पहचान,
वो हो चली भावुक.....!

बोली बड़ी आत्मीयता से,
व्यर्थ है...! अधिक 'पर' न फैलाना ,
क्षमता नहीं...! कहाँ उड़ पायेगी......?
तुझे नीचे भी है आना.....!!

दूरी तय करनी है तुझे,
हवाओं को जकड़ के रख,
वेग अधिक होगा पर फिर भी,
कसकर पकड़ के रख........!

ऐसा न हो तू बदहवास सी गिरे,
गुरुत्वाकर्षण से.......डरती फिरे,
महत्वाकांक्षा अपनी संभाल के रख,
मैं ज़मीं हूँ ज़मीं........... मुझमे समा जाएगी,
ज़रा इतना तो ध्यान रख ............!!

पता चलते ही कि कौन है....?
मैंने उसे प्रत्योत्तर दिया...!!

जमीन मे जो समा गयी तो,
बीज मैं बन जाऊँगी,
वृक्ष उगेगा स्वाभिमान का,
आत्म-बल सभी को दे पाऊँगी |

विश्वास छलके, हमेशा उस से,
फल ऐसा दे जाऊँगी,
वितरण होगा आत्मियता का,
शाश्वत पहचान बनाऊँगी |

ज़रूरत नहीं मुझे, किसी के उलारों की......!
क्योकि "रोहिणी" हूँ मैं,  एक स्त्री, स्वछंद विचारों की |


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com







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