by Rohini Negi on Sunday, May 29, 2011 at 3:15pm
कुछ अध्-बुने ख्याल,
मन को झिंझोड़ते हैं,
जैसे शांत नदी में उफनती,
तेज लहर की उथल-पुथल |
जो.......कुछ पल के लिए,
उसके ठहराव को,
उग्ग्रता में बदल देती है,
उसका चैन छीन लेती है |
सोचती है ऐसा करने से,
उसकी प्रकृति बदल देगी,
बहने का अंदाज़ बदल देगी,
मूर्ख है इतना नहीं समझती |
उसकी उग्ग्रता पल दो पल है,
नदी का शांत बहाव,
कब लहर की उग्ग्रता समेत ले,
शायद पता भी न चले.....?
क्या.......उसका उफान, उसका तेज,
उसकी अधीरता, उसका वेग,
सरल, सरस और निश्छल नदी को,
अपने रंग में ढाल पायेगा.......??
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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